छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित सिरपुर को यूनेस्को ने केवल मंदिरों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और पुरातात्विक परिदृश्य के रूप में देखा है। उसके अनुसार, इसका ऐतिहासिक विकास लगभग 5वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ और यह प्राचीन दक्षिण कोसल की राजनीतिक, धार्मिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यूनेस्को यह भी बताता है कि 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में बौद्ध मठों और धार्मिक गतिविधियों का उल्लेख किया था।

सिरपुर की एक खासियत यह है कि यहां हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं का सह-अस्तित्व है। यहां आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वस्तिक विहार तथा हर्षगुप्त-तीवरदेव बौद्ध विहार जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध अवशेष भी मौजूद हैं। यूनेस्को ने इसी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक स्वरूप को सिरपुर के असाधारण महत्व का एक महत्वपूर्ण आधार माना है।

सिरपुर का महत्व केवल धार्मिक स्थापत्य तक सीमित नहीं है। पुरातात्विक उत्खननों से यहां बाजार परिसर, आवासीय संरचनाएं, जल-प्रबंधन व्यवस्था, कुएं, स्नानगृह, सड़कें, राजमहल और व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। इससे पता चलता है कि प्राचीन सिरपुर एक विकसित नगरीय और व्यापारिक केंद्र था। यूनेस्को ने इसे प्रारंभिक मध्यकालीन नदी-आधारित नगरीय केंद्र के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।